योगापट्टी, पश्चिम चंपारण | योगापट्टी प्रखंड के डुमरी पंचायत भवन में शुक्रवार को ‘सकारात्मक पुरुषतत्त्व’ बिषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। प्रथम संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में अभिभावकों और किशोर – किशोरियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उदेश्य समाज में गहरी जड़ें जमा चुके जेंडर आधारित भेदभाव को खत्म करना और किशोरों में समानता, सम्मान व आत्ममूल्य की भावना विकसित करना था। ये पहल बाल हितेषी ग्राम पंचायत योगापट्टी 2026 के विज़न से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है, जिसके तहत पंचायत के बच्चों और किशोरों के लिए सुरक्षित व संवेदनशील बनाया जा रहा है।
जेंडर और लिंग : अंतर समझना क्यों जरूरी है
कार्यशाला की शुरुआत करते हुए प्रथम संस्था के समन्वयक शुभम कुमार ने सबसे पहले ‘लिंग’ और ‘जेंडर’ के बीच का मूलभूत अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि लिंग व्यक्ति की जैविक पहचान है जो जन्म के साथ तय होती है। वहीं जेंडर एक सामाजिक संरचना है। समाज तय करता है कि लड़का क्या पहनेगा, क्या काम करेगा और लड़की की क्या भूमिका होगी। यही सोच आगे चलकर भेदभाव का रूप ले लेती है। शुभम कुमार ने कहा कि जेंडर आधारित भेदभाव सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है। जब हम लड़कों से कहते हैं कि ‘लड़के रोते नहीं हैं’ या ‘तुम्हें मजबूत दिखना है’, तब हम उन पर भी एक तरह का मानसिक दबाव डालते हैं। सकारात्मक पुरुषतत्त्व का मतलब है ऐसी सोच को बढ़ावा देना जहां लड़के संवेदनशील भी हों, घर के काम में हाथ बंटाएं और महिलाओं का सम्मान करें।

गतिविधियों से तोड़ी गई रूढ़िवादी सोच
कार्यशाला को संवादात्मक बनाने के लिए कई गतिविधियां करवाई गईं। प्रतिभागियों को कुछ शब्द दिए गए और पूछा गया कि वे इन कामों को किस जेंडर से जोड़ते हैं। शब्दों की सूची में झाड़ू लगाना, बर्तन धोना, हथौड़ा चलाना, ड्राइविंग, परिवार का मुखिया, सिलाई, नर्स, पायलट, खाना बनाना, बच्चे को खिलाना, वजन उठाना और मजबूत जैसे शब्द शामिल थे।ज्यादातर किशोरों ने शुरुआत में झाड़ू लगाना, बर्तन धोना और सिलाई को महिलाओं से जोड़ा, जबकि ड्राइविंग, हथौड़ा और परिवार का मुखिया होना पुरुषों से। इसके बाद समन्वयक ने उदाहरण देकर बताया कि देश में कई पुरुष शेफ हैं जो खाना बनाते हैं और कई महिला पायलट व ड्राइवर हैं। नर्सिंग में भी अब पुरुष आ रहे हैं। गतिविधि के अंत में यह संदेश दिया गया कि काम का बंटवारा योग्यता और रुचि के आधार पर होना चाहिए, जेंडर के आधार पर नहीं। जेंडर केवल महिला एवं पुरुषों के संबंध में समाज द्वारा तय कार्यों का वर्णन करता है, यह कोई प्राकृतिक नियम नहीं है।
आत्मसम्मान: पहचान स्किल से बनती है, शरीर से नहीं
कार्यशाला के दूसरे सत्र में आत्मसम्मान और आत्ममूल्यांकन पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रतिभागियों को कई चित्र दिखाए गए और पूछा गया कि तस्वीर देखकर उन्हें क्या लगता है। एक तस्वीर में सांवली लड़की थी, दूसरी में मोटा लड़का। ज्यादातर लोगों ने माना कि समाज अक्सर रंग-रूप और शरीर की बनावट के आधार पर लोगों को जज करता है। इस पर शुभम कुमार ने गांव स्तर के उदाहरण देते हुए समझाया कि खेत में काम करने वाला किसान धूप में काला हो जाता है, पर उसकी मेहनत का सम्मान होता है। कोई व्यक्ति पढ़ाई में तेज हो सकता है, कोई खेल में, कोई संगीत में। हर इंसान अपने आप में खास होता है। सोशल मीडिया पर दिखने वाले फिल्टर और परफेक्ट बॉडी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है। शरीर की बनावट से कोई अच्छा या बुरा नहीं होता। असली पहचान आपके गुणों, व्यवहार और स्किल से बनती है।
इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि जब हम बच्चों को कमजोर समझते हैं या उनसे उनकी क्षमता से अधिक काम करवाते हैं, तो यह भी एक तरह का शोषण है। इसी मानसिकता की वजह से बाल श्रम जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। बेतिया जिले में बाल श्रम के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाकर बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया गया था। सकारात्मक पुरुषतत्त्व की सोच रखनी है तो हमें घर के लड़कों को भी सिखाना होगा कि वे अपनी बहनों का हक न मारें और उन्हें पढ़ने-आगे बढ़ने का मौका दें।
अभिभावकों की भूमिका सबसे अहम
कार्यशाला में मौजूद अभिभावकों से खास बातचीत की गई। उन्हें बताया गया कि बदलाव की शुरुआत घर से ही होती है। अगर पिता खाना बनाने या बर्तन धोने में मां की मदद करेगा, तो बेटा भी वही सीखेगा। अगर घर में बेटी को बेटे के बराबर मौके दिए जाएंगे, तो वह आत्मविश्वास से भरी होगी।
एक अभिभावक ने सवाल पूछा कि गांव में तो लोग ताना मारते हैं कि ‘लड़का होकर चौका-बर्तन कर रहा है’। इस पर समन्वयक ने जवाब दिया कि बदलाव के लिए हिम्मत चाहिए। पहले एक घर से शुरुआत होगी, फिर धीरे-धीरे पूरा गांव सीखेगा। आज जो काम मुश्किल लग रहा है, कल वही सामान्य लगेगा।
पंचायत प्रतिनिधियों ने दिया समर्थन
कार्यक्रम में डुमरी पंचायत के सरपंच ने कहा कि पंचायत स्तर पर ऐसी कार्यशालाएं बहुत जरूरी हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि पंचायत भवन में हर महीने किशोर-किशोरियों के लिए जागरूकता सत्र आयोजित किए जाएंगे। कार्यपालक सहायक और ग्राम कचहरी सचिव ने भी कहा कि जेंडर समानता का मुद्दा बाल हितैषी पंचायत के 9 मानकों में से एक है। 2026 तक योगापट्टी को बाल हितैषी बनाने के लक्ष्य को पाने के लिए इस तरह की सोच बदलना जरूरी है।

विकास मित्र ने बताया कि वे गांव में घूम-घूम कर उन परिवारों की पहचान करेंगे जहां लड़के-लड़कियों में भेदभाव होता है और उन्हें काउंसलिंग के लिए प्रेरित करेंगे। प्रथम संस्था से सोनू कुमार ने कहा कि संस्था अगले 6 महीने तक डुमरी पंचायत में फॉलो-अप सत्र लेगी ताकि यह देखा जा सके कि किशोरों की सोच में कितना बदलाव आया है।
किशोरों ने साझा किए अनुभव
कार्यशाला के अंत में किशोरों से फीडबैक लिया गया। कक्षा 9 की एक छात्रा ने कहा कि आज उसे समझ आया कि खाना बनाना सिर्फ लड़की का काम नहीं है। अब वह अपने भाई को भी किचन में मदद करने के लिए कहेगी। वहीं कक्षा 10 के एक छात्र ने माना कि वह अब तक सोचता था कि रोना कमजोरी की निशानी है, लेकिन आज समझ आया कि भावनाएं व्यक्त करना इंसान होने का हिस्सा है।कई किशोरों ने यह भी कहा कि वे सोशल मीडिया पर लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग तरह के मीम्स देखते हैं जिससे गलत मैसेज जाता है। अब वे ऐसी चीजों को लाइक या शेयर नहीं करेंगे।
आगे की राह
कार्यशाला का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि सभी प्रतिभागी अपने घर से जेंडर समानता की शुरुआत करेंगे। प्रथम संस्था अब योगापट्टी के अन्य पंचायतों में भी ऐसे सत्र आयोजित करेगी। सकारात्मक पुरुषतत्त्व की अवधारणा को स्कूलों के पाठ्यक्रम से जोड़ने के लिए शिक्षा विभाग से भी बात की जाएगी।कुल मिलाकर यह कार्यशाला योगापट्टी प्रखंड में सामाजिक बदलाव की एक छोटी लेकिन मजबूत शुरुआत है। जब किशोरों की सोच बदलेगी, तभी बाल विवाह, बाल श्रम और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएं जड़ से खत्म होंगी। बाल हितैषी ग्राम पंचायत योगापट्टी 2026 का सपना तभी पूरा होगा जब हर घर में बेटे और बेटी को एक नजर से देखा जाएगा।