पश्चिमी चंपारण के योगापट्टी प्रखंड मुख्यालय स्थित सभागार में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया। प्रखंड के सभी माननीय मुखिया, कार्यपालक सहायक और पंचायत सचिवों के लिए ‘बाल हितैषी ग्राम पंचायत एवं बाल पंचायत गठन’ विषय पर एक दिवसीय प्रखंड स्तरीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य पंचायतों को बच्चों के लिए सुरक्षित, सहभागी और जवाबदेह बनाना है।

कार्यक्रम की संयुक्त अध्यक्षता प्रखंड विकास पदाधिकारी शशि भूषण कुमार और प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी अनिल कुमार ने की। यूनिसेफ की तकनीकी सहयोगी संस्था ‘प्रथम’ के जिला समन्वयक अमर सिंह मुख्य प्रशिक्षक के रूप में मौजूद रहे। उन्होंने बाल पंचायत के गठन से लेकर ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में बच्चों के मुद्दों को शामिल करने की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया। प्रथम संस्था के प्रखंड समन्वयक शुभम कुमार ने बाल अधिकार, सुरक्षा और किशोर-किशोरियों की भागीदारी पर सत्र लिया। बैठक में सभी पंचायतों के मुखियागण, कर्मी तथा प्रथम से सोनू कुमार, पूजा कुमारी समेत अन्य सदस्य शामिल हुए।
आधिकारिक अपडेट: सरकार के निर्देश क्या हैं?
यह उन्मुखीकरण बिहार सरकार के पंचायती राज विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त ‘बाल हितैषी ग्राम पंचायत अभियान’ का हिस्सा है। प्रशिक्षण में दिए गए मुख्य सरकारी निर्देश इस प्रकार हैं:
- बाल पंचायत का गठन: हर ग्राम पंचायत के प्रत्येक वार्ड से 1 किशोर और 1 किशोरी का लोकतांत्रिक तरीके से चयन होगा। 12 वार्ड वाली पंचायत में 24 सदस्यीय बाल पंचायत बनेगी। उम्र 11-18 वर्ष होगी। कार्यकाल एक वर्ष का रहेगा।
- GPDP से सीधा जुड़ाव: बाल पंचायत अपनी जरूरतों का प्रस्ताव बनाएगी। इन्हें अनिवार्य रूप से ग्राम पंचायत विकास योजना में शामिल किया जाएगा। केंद्र और राज्य से मिलने वाले अनुदान का ‘बाल विकास घटक’ इन्हीं योजनाओं पर खर्च होगा। जैसे – स्कूल में झूला, पुस्तकालय, किशोरी स्वच्छता केंद्र, खेल सामग्री।
- साल में 4 अनिवार्य बाल सभा: हर पंचायत में बाल सभा आयोजित करना अनिवार्य। इसमें बाल पंचायत सदस्य एजेंडा तय करेंगे।
- CWPC को पुनर्जीवित करना: बाल कल्याण एवं संरक्षण समिति (Child Welfare & Protection Committee) हर पंचायत में सक्रिय होगी। मुखिया इसके अध्यक्ष होंगे। इसमें वार्ड सदस्य, शिक्षक, ANM, आंगनवाड़ी सेविका और बाल पंचायत से 2 प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति बाल विवाह, बाल श्रम, ड्रॉपआउट रोकने का काम करेगी।
प्रखंड समन्वयक शुभम कुमार ने स्पष्ट किया कि ‘बच्चा’ की परिभाषा 0-18 वर्ष और ‘किशोर-किशोरी’ 10-19 वर्ष है। उन्होंने बाल अधिकार कन्वेंशन के 4 स्तंभ – जीवन का अधिकार, विकास का अधिकार, संरक्षण का अधिकार और सहभागिता का अधिकार – को पंचायत से जोड़ा।
ग्राउंड रिपोर्ट: योगापट्टी क्यों बना मॉडल प्रखंड?
पश्चिमी चंपारण में बाल विवाह की दर 41.2% और बाल श्रम के मामले चिंताजनक हैं। NFHS-5 के अनुसार जिले में 15-19 वर्ष की 28% लड़कियां एनीमिया से ग्रस्त हैं। ऐसे में योगापट्टी में यह पहल महत्वपूर्ण है। BDO शशि भूषण कुमार ने कहा, “हम सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं करेंगे। अगले 15 दिन में हर पंचायत में वार्ड सभा कराकर पारदर्शी तरीके से बाल पंचायत का चुनाव होगा। इसकी वीडियोग्राफी कराई जाएगी।”

जिला समन्वयक अमर सिंह ने बताया कि बाल पंचायत के सदस्य ‘बाल मित्र’ के रूप में काम करेंगे। वे स्कूल न जाने वाले बच्चों की सूची बनाएंगे, आंगनवाड़ी केंद्रों की निगरानी करेंगे और हेल्पलाइन 1098 का प्रचार करेंगे। प्रथम संस्था हर पंचायत को ‘बाल पंचायत किट’ देगी जिसमें रजिस्टर, चार्ट पेपर और खेल सामग्री होगी।
लोगों को क्या फायदा होगा
- बच्चों और किशोरों को: अपनी बात रखने का मंच मिलेगा। स्कूल में शौचालय, पेयजल, लाइब्रेरी जैसी मांगें सीधे GPDP में जाएंगी। कौशल प्रशिक्षण से जुड़कर 18 साल बाद रोजगार के मौके बनेंगे। यौन शोषण, हिंसा की घटनाओं पर चुप्पी टूटेगी।
- लड़कियों को विशेष लाभ: राष्ट्रीय बालिका दिवस पर बाल सभा होने से माहवारी, सुरक्षा, सेनेटरी पैड जैसे मुद्दे मुख्यधारा में आएंगे। बाल विवाह का विरोध करने की हिम्मत बढ़ेगी। कन्या उत्थान योजना की जानकारी मिलेगी।
- माता-पिता को: बच्चों की सुरक्षा को लेकर निश्चिंतता बढ़ेगी। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं – मुख्यमंत्री बाल सहायता योजना, परवरिश योजना – का लाभ लेने में आसानी होगी।
- मुखिया और पंचायत को: ‘बाल हितैषी पंचायत’ प्रमाणन मिलने पर 15वें वित्त आयोग से 10% अतिरिक्त अनुदान मिल सकता है। राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार में अलग श्रेणी है। सबसे बड़ा फायदा – जनता का विश्वास बढ़ेगा।
- पूरे समाज को: जब बच्चे नशा, दहेज, छुआछूत के खिलाफ बोलेंगे तो सामाजिक कुरीतियां कम होंगी। पंचायत में युवाओं की ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगेगी। पलायन रुकेगा क्योंकि गांव में ही अवसर दिखेंगे।
यूनिसेफ के अध्ययन बताते हैं कि जहां बाल पंचायत सक्रिय हैं, वहां 3 साल में बाल विवाह 22% और ड्रॉपआउट रेट 35% तक घटा है।