समस्तीपुर अनुमंडल में SC-ST अत्याचार मामलों में लापरवाही पर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को सदर अनुमंडल पदाधिकारी दिलीप कुमार की अध्यक्षता में अनुमंडल स्तरीय सतर्कता एवं अनुश्रवण समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा करना, लंबित मामलों की स्थिति को समझना तथा पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम सुनिश्चित करना था।
बैठक में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। समस्तीपुर की विधायक अश्वमेघ देवी के अलावा अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (एसडीपीओ), विभिन्न थाना क्षेत्रों के प्रभारी, अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) और कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। इस व्यापक भागीदारी से यह स्पष्ट हुआ कि प्रशासन इस संवेदनशील विषय को गंभीरता से ले रहा है और समन्वित प्रयासों के जरिए सुधार लाना चाहता है।
समस्तीपुर में SC-ST एक्ट मामलों पर सख्ती, SDO की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक
बैठक के दौरान सदर एसडीओ ने अनुमंडल के विभिन्न थाना क्षेत्रों में दर्ज एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामलों की क्रमवार समीक्षा की। उन्होंने हर केस की प्रगति, दर्ज प्राथमिकी, जांच की स्थिति और आरोपियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी ली। समीक्षा के दौरान यह भी देखा गया कि किन मामलों में अनावश्यक देरी हुई है और उसके पीछे के कारण क्या हैं।

दिलीप कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही, देरी या उदासीनता को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी थाना प्रभारियों को निर्देश देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में तुरंत प्राथमिकी दर्ज की जाए और जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवेदनशीलता बनाए रखी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि पीड़ितों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
जैसे अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रशासन सतर्क है, वैसे ही बाल विवाह रोकने और बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए भी कानून स्पष्ट दिशा देता है। इसके बारे में आप हमारी बाल विवाह मुक्त भारत पर पिछली रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।”
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि पीड़ितों को समय पर न्याय मिलना ही प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए पुलिस, कल्याण विभाग और प्रशासनिक इकाइयों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई गई। एसडीओ ने कहा कि यदि सभी विभाग मिलकर कार्य करें, तो न केवल मामलों का शीघ्र निष्पादन संभव है, बल्कि पीड़ितों का विश्वास भी प्रशासन में मजबूत होगा।
पीड़ितों को सहायता और न्याय में तेजी पर जोर, जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश
अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे पीड़ितों को मिलने वाली सरकारी सहायता और मुआवजा योजनाओं की जानकारी समय पर उपलब्ध कराएं। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि पात्र लाभार्थियों को किसी प्रकार की देरी के बिना सहायता राशि मिले। कई मामलों में देखा गया है कि आर्थिक सहायता में देरी से पीड़ितों की स्थिति और कठिन हो जाती है, इसलिए इस पहलू पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।एसडीपीओ को निर्देश दिया गया कि वे नियमित रूप से थाना स्तर पर समीक्षा बैठक करें और यह सुनिश्चित करें कि अनुसंधान में कोई ढिलाई न बरती जाए। उन्होंने यह भी कहा कि गंभीर मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी आवश्यक है ताकि जांच निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से पूरी हो सके।
बैठक के दौरान जनप्रतिनिधियों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं सामने रखीं। उन्होंने कुछ मामलों में पुलिस की धीमी कार्रवाई और पीड़ितों के प्रति असंवेदनशील रवैये की शिकायत की। इस पर एसडीओ ने भरोसा दिलाया कि सभी शिकायतों की जांच की जाएगी और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी।बैठक का एक महत्वपूर्ण पहलू जागरूकता पर भी केंद्रित रहा। यह सुझाव दिया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को उनके अधिकारों और कानून की जानकारी दी जाए। इससे न केवल अत्याचार की घटनाओं में कमी आएगी, बल्कि पीड़ित बिना डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
अंत में, दिलीप कुमार ने सभी अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि यह केवल एक कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई गई, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस बैठक के माध्यम से प्रशासन ने यह संकेत दिया है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा। अब देखना यह होगा कि दिए गए निर्देशों का पालन कितनी गंभीरता से किया जाता है और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया कितनी तेज होती है।